गबन - Gaban

घर छोड़कर भागा नहीं जाता हूं। इतने अधीर क्यों हुए जाते हो? '

चरनदास-'साल-भर हुआ, एक कौड़ी नहीं मिली, अधीर न हों तो क्या हों। कल कम-से-कम दो सौ की गिकर कर रखिएगा।'

रमानाथ-'मैंने कह दिया, मेरे पास अभी रूपये नहीं हैं।'

चरनदास-'रोज़ गठरी काट-काटकर रखते हो, उस पर कहते हो, रूपये नहीं हैं। कल रूपये जुटा रखना। कल आदमी जाएगा जरूर।'

रमा ने उसका कोई जवाब न दिया, आगे बढ़ा। इधर आया था कि कुछ काम निकलेगा, उल्टे तकाज़ा सहना


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घर छोड़कर भागा नहीं जाता हूं। इतने अधीर क्यों हुए जाते हो? '

चरनदास-'साल-भर हुआ, एक कौड़ी नहीं मिली, अधीर न हों तो क्या हों। कल कम-से-कम दो सौ की गिकर कर रखिएगा।'

रमानाथ-'मैंने कह दिया, मेरे पास अभी रूपये नहीं हैं।'

चरनदास-'रोज़ गठरी काट-काटकर रखते हो, उस पर कहते हो, रूपये नहीं हैं। कल रूपये जुटा रखना। कल आदमी जाएगा जरूर।'

रमा ने उसका कोई जवाब न दिया, आगे बढ़ा। इधर आया था कि कुछ काम निकलेगा, उल्टे तकाज़ा सहना


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