मगर जालपा को शहजादी का यह व्यंग्य, संवेदना से परिपूर्ण जान पड़ा। सजल नेत्र होकर बोली--क्या करोगी पूछकर बहन, जो होना था सो हो गया!
शहजादी--तुम पूछने को कहती हो, मैं रूलाकर छोड़ूंगी। मेरे चढ़ाव पर कंगन नहीं आया था, उस वक्त मन ऐसा खक्रा हुआ कि सारे गहनों पर लात मार दूं। जब तक कंगन न बन गए, मैं नींद भर सोई नहीं।
राधा--तो क्या तुम जानती हो, जालपा का चन्द्रहार न बनेगा।
शहजादी--बनेगा तब बनेगा, इस अवसर पर तो नहीं बना। दस-पांच की चीज़ तो है नहीं,
मगर जालपा को शहजादी का यह व्यंग्य, संवेदना से परिपूर्ण जान पड़ा। सजल नेत्र होकर बोली--क्या करोगी पूछकर बहन, जो होना था सो हो गया!
शहजादी--तुम पूछने को कहती हो, मैं रूलाकर छोड़ूंगी। मेरे चढ़ाव पर कंगन नहीं आया था, उस वक्त मन ऐसा खक्रा हुआ कि सारे गहनों पर लात मार दूं। जब तक कंगन न बन गए, मैं नींद भर सोई नहीं।
राधा--तो क्या तुम जानती हो, जालपा का चन्द्रहार न बनेगा।
शहजादी--बनेगा तब बनेगा, इस अवसर पर तो नहीं बना। दस-पांच की चीज़ तो है नहीं,