और अब दयानाथ को अपनी लाज रखने का कोई उपाय न सूझता था। कोई चलता हुआ आदमी शायद इतना व्यग्र न होता, हीले-हवाले करके महाजन को महीनों टालता रहता; लेकिन दयानाथ इस मामले में अनाड़ी थे।
जागेश्वरी ने आकर कहा--भोजन कब से बना ठंडा हो रहा है। खाकर तब बैठो।
दयानाथ ने इस तरह गर्दन उठाई, मानो सिर पर सैकड़ों मन का बोझ लदा हुआ है। बोले--तुम लोग जाकर खा लो, मुझे भूख नहीं है।
जागेश्वरी--भूख क्यों नहीं है, रात भी तो कुछ नहीं खाया था!
और अब दयानाथ को अपनी लाज रखने का कोई उपाय न सूझता था। कोई चलता हुआ आदमी शायद इतना व्यग्र न होता, हीले-हवाले करके महाजन को महीनों टालता रहता; लेकिन दयानाथ इस मामले में अनाड़ी थे।
जागेश्वरी ने आकर कहा--भोजन कब से बना ठंडा हो रहा है। खाकर तब बैठो।
दयानाथ ने इस तरह गर्दन उठाई, मानो सिर पर सैकड़ों मन का बोझ लदा हुआ है। बोले--तुम लोग जाकर खा लो, मुझे भूख नहीं है।
जागेश्वरी--भूख क्यों नहीं है, रात भी तो कुछ नहीं खाया था!