दयानाथ ज़ोर देकर बोले--शर्म करने का यह अवसर नहीं है। इन्हें मांगना पड़ेगा!
रमानाथ ने झेंपते हुए कहा--मैं मांग तो नहीं सकता, कहिए उठा लाऊं।
यह कहते-कहते लज्जा, क्षोभ और अपनी नीचता के ज्ञान से उसकी आंखें सजल हो गई।
दयानाथ ने भौंचक्ध होकर कहा--उठा लाओगे, उससे छिपाकर?
रमानाथ ने तीव्र कंठ से कहा--और आप क्या समझ रहे हैं?
दयानाथ ने माथे पर हाथ रख लिया, और एक क्षण के बाद आहत कंठ से बोले--नहीं, मैं ऐसा न करने दूंगा। मैंने छल कभी नहीं किया,
दयानाथ ज़ोर देकर बोले--शर्म करने का यह अवसर नहीं है। इन्हें मांगना पड़ेगा!
रमानाथ ने झेंपते हुए कहा--मैं मांग तो नहीं सकता, कहिए उठा लाऊं।
यह कहते-कहते लज्जा, क्षोभ और अपनी नीचता के ज्ञान से उसकी आंखें सजल हो गई।
दयानाथ ने भौंचक्ध होकर कहा--उठा लाओगे, उससे छिपाकर?
रमानाथ ने तीव्र कंठ से कहा--और आप क्या समझ रहे हैं?
दयानाथ ने माथे पर हाथ रख लिया, और एक क्षण के बाद आहत कंठ से बोले--नहीं, मैं ऐसा न करने दूंगा। मैंने छल कभी नहीं किया,