जालपा ने उठकर पूछा--पोटली में क्या है?
रमानाथ--बूझ जाओ तो जानूं ।
जालपा--हंसी का गोलगप्पा है! (यह कहकर हंसने लगी।)
रमानाथ-मलतब?
जालपा--नींद की गठरी होगी!
रमानाथ--मलतब?
जालपा--तो प्रेम की पिटारी होगी!
रमानाथ- ठीक, आज मैं तुम्हें फूलों की देवी बनाऊंगा।
जालपा खिल उठी। रमा ने बडे अनुराग से उसे फूलों के गहने पहनाने शुरू किए, फूलों के शीतल कोमल स्पर्श से जालपा के कोमल शरीर में गुदगुदी-सी होने लगी। उन्हीं फूलों की भांति उसका एक-एक रोम प्रफुल्लित हो गया।
जालपा ने उठकर पूछा--पोटली में क्या है?
रमानाथ--बूझ जाओ तो जानूं ।
जालपा--हंसी का गोलगप्पा है! (यह कहकर हंसने लगी।)
रमानाथ-मलतब?
जालपा--नींद की गठरी होगी!
रमानाथ--मलतब?
जालपा--तो प्रेम की पिटारी होगी!
रमानाथ- ठीक, आज मैं तुम्हें फूलों की देवी बनाऊंगा।
जालपा खिल उठी। रमा ने बडे अनुराग से उसे फूलों के गहने पहनाने शुरू किए, फूलों के शीतल कोमल स्पर्श से जालपा के कोमल शरीर में गुदगुदी-सी होने लगी। उन्हीं फूलों की भांति उसका एक-एक रोम प्रफुल्लित हो गया।