गबन - Gaban

गहना उसकी आंखों में जंचता ही न था। एक दिन दीनदयाल लौटे, तो मानकी के लिए एक चन्द्रहार लाए। मानकी को यह साके बहुत दिनों से थी। यह हार पाकर वह मुग्ध हो गई। जालपा को अब अपना हार अच्छा न लगता, पिता से बोली--बाबूजी, मुझे भी ऐसा ही हार ला दीजिए।

दीनदयाल ने मुस्कराकर कहा-ला दूंगा, बेटी!

कब ला दीजिएगा

बहुत जल्दी ।

बाप के शब्दों से जालपा का मन न भरा।

उसने माता से जाकर कहा-अम्मांजी, मुझे भी अपना सा हार बनवा दो।

मां-वह तो बहुत रूपयों में बनेगा, बेटी!


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गहना उसकी आंखों में जंचता ही न था। एक दिन दीनदयाल लौटे, तो मानकी के लिए एक चन्द्रहार लाए। मानकी को यह साके बहुत दिनों से थी। यह हार पाकर वह मुग्ध हो गई। जालपा को अब अपना हार अच्छा न लगता, पिता से बोली--बाबूजी, मुझे भी ऐसा ही हार ला दीजिए।

दीनदयाल ने मुस्कराकर कहा-ला दूंगा, बेटी!

कब ला दीजिएगा

बहुत जल्दी ।

बाप के शब्दों से जालपा का मन न भरा।

उसने माता से जाकर कहा-अम्मांजी, मुझे भी अपना सा हार बनवा दो।

मां-वह तो बहुत रूपयों में बनेगा, बेटी!


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