लेकिन न जाने क्यों जब मैं क्षुधातुर होता हूं तो मुझे उस नाटक रचने वाले कवियों की याद आती है जो बादशाहों की मेज पर भोजन किया करते थे और मेरे मुंह में पानी भर आता है। लेकिन जब मैं वह सुधारस पान करके तृप्त हो जाता हूं, जिसकी महाशय कोटा के यहां कोई कमी नहीं मालूम होती, और जिसके पिलाने में वह इतने उदार हैं, तो मेरी कल्पना वीररस में मग्न हो जाती है, योद्घाओं के वीरचरित्र आंखों में फिरने लगते हैं, घोड़ों की टापों और तलवार की
लेकिन न जाने क्यों जब मैं क्षुधातुर होता हूं तो मुझे उस नाटक रचने वाले कवियों की याद आती है जो बादशाहों की मेज पर भोजन किया करते थे और मेरे मुंह में पानी भर आता है। लेकिन जब मैं वह सुधारस पान करके तृप्त हो जाता हूं, जिसकी महाशय कोटा के यहां कोई कमी नहीं मालूम होती, और जिसके पिलाने में वह इतने उदार हैं, तो मेरी कल्पना वीररस में मग्न हो जाती है, योद्घाओं के वीरचरित्र आंखों में फिरने लगते हैं, घोड़ों की टापों और तलवार की