से हटना दोनों ही व्यर्थ हैं। हमारे जीवन और मरण में कोई भेद नहीं।'
पापनाशी-'क्या, क्या? क्या तुम अनन्त जीवन के आकांक्षी नहीं हो ? लेकिन तुम तो तपस्वियों की भांति वन्यकुटी में रहते हो ?'
'हां, ऐसा जान पड़ता है।'
'क्या मैं तुम्हें नग्न और विरत नहीं देखता ?'
'हां, ऐसा जान पड़ता है।'
'क्या तुम कन्दमूल नहीं खाते और इच्छाओं का दमन नहीं करते ?'
'हां, ऐसा जान पड़ता है।'
'क्या तुमने संसार के मायामोह को नहीं त्याग दिया है ?'
से हटना दोनों ही व्यर्थ हैं। हमारे जीवन और मरण में कोई भेद नहीं।'
पापनाशी-'क्या, क्या? क्या तुम अनन्त जीवन के आकांक्षी नहीं हो ? लेकिन तुम तो तपस्वियों की भांति वन्यकुटी में रहते हो ?'
'हां, ऐसा जान पड़ता है।'
'क्या मैं तुम्हें नग्न और विरत नहीं देखता ?'
'हां, ऐसा जान पड़ता है।'
'क्या तुम कन्दमूल नहीं खाते और इच्छाओं का दमन नहीं करते ?'
'हां, ऐसा जान पड़ता है।'
'क्या तुमने संसार के मायामोह को नहीं त्याग दिया है ?'