रंगभूमि - Rangbhumi

और अंत में कचहरी के कर्मचारियों और वकीलों की जेब में चले जाते हैं।

मिसेज़ सेवक-साईस, इस अंधे से कह दो, भाग जाए, पैसे नहीं हैं।

सोफ़िया-नहीं मामा, पैसे हों तो दे दीजिए। बेचारा आधो मील से दौड़ा आ रहा है, निराश हो जाएगा। उसकी आत्मा को कितना दु:ख होगा।

माँ-तो उससे किसने दौड़ने को कहा था? उसके पैरों में दर्द होता होगा।

सोफ़िया-नहीं, अच्छी मामा, कुछ दे दीजिए, बेचारा कितना हाँफ रहा है। प्रभु सेवक ने जेब से केस निकाला; किंतु ताँबे या निकिल का कोई टुकड़ा न निकला,


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और अंत में कचहरी के कर्मचारियों और वकीलों की जेब में चले जाते हैं।

मिसेज़ सेवक-साईस, इस अंधे से कह दो, भाग जाए, पैसे नहीं हैं।

सोफ़िया-नहीं मामा, पैसे हों तो दे दीजिए। बेचारा आधो मील से दौड़ा आ रहा है, निराश हो जाएगा। उसकी आत्मा को कितना दु:ख होगा।

माँ-तो उससे किसने दौड़ने को कहा था? उसके पैरों में दर्द होता होगा।

सोफ़िया-नहीं, अच्छी मामा, कुछ दे दीजिए, बेचारा कितना हाँफ रहा है। प्रभु सेवक ने जेब से केस निकाला; किंतु ताँबे या निकिल का कोई टुकड़ा न निकला,


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