तो ठुनककर बोला-मैं रोटी और गुड़ न खाऊँगा। यह कहकर उठ खड़ा हुआ।
सूरदास-बेटा, बहुत अच्छा गुड़ है, खाओ तो। देखो, कैसी नरम-नरम रोटियाँ हैं। गेहूँ की हैं।
मिट्ठू-मैं न खाऊँगा।
सूरदास-तो क्या खाओगे बेटा? इतनी रात गए और क्या मिलेगा?
मिट्ठू-मैं तो दूध-रोटी खाऊँगा।
सूरदास-बेटा, इस जून खा लो। सबेरे मैं दूध ला दूँगा।
मिट्ठू रोने लगा। सूरदास उसे बहलाकर हार गया, तो अपने भाग्य को रोता हुआ उठा, लकड़ी सँभाली और टटोलता हुआ बजरंगी अहीर के घर आया,
तो ठुनककर बोला-मैं रोटी और गुड़ न खाऊँगा। यह कहकर उठ खड़ा हुआ।
सूरदास-बेटा, बहुत अच्छा गुड़ है, खाओ तो। देखो, कैसी नरम-नरम रोटियाँ हैं। गेहूँ की हैं।
मिट्ठू-मैं न खाऊँगा।
सूरदास-तो क्या खाओगे बेटा? इतनी रात गए और क्या मिलेगा?
मिट्ठू-मैं तो दूध-रोटी खाऊँगा।
सूरदास-बेटा, इस जून खा लो। सबेरे मैं दूध ला दूँगा।
मिट्ठू रोने लगा। सूरदास उसे बहलाकर हार गया, तो अपने भाग्य को रोता हुआ उठा, लकड़ी सँभाली और टटोलता हुआ बजरंगी अहीर के घर आया,