ऐसे हिंदू व्यापारी भी इने-गिने ही थे जो अंदमान में उन समूहों को खरीद सकते थे। अतः स्पष्ट है, उनमें से प्रायः सारे समूह तत्रस्थ यूरोपियन तथा एंग्लो-इंडियन लोगों के हाथों ही लग रहे हैं। जिन थोडे़ से भारतीय व्यापारियों अथवा सहयोग न मिल सकने के कारण धनार्जन का यह स्वर्ण अवसर व्यर्थ सिद्व हो रहा है। जंगलों की कटाई करके उपनिवेश बसाने के लिए भी सरकार ने अत्यंत सुलभ सुविधाओं पर भूभाग देने की योजना बनाई है। इक्की-दुक्की ईसाई संस्थाओं
ऐसे हिंदू व्यापारी भी इने-गिने ही थे जो अंदमान में उन समूहों को खरीद सकते थे। अतः स्पष्ट है, उनमें से प्रायः सारे समूह तत्रस्थ यूरोपियन तथा एंग्लो-इंडियन लोगों के हाथों ही लग रहे हैं। जिन थोडे़ से भारतीय व्यापारियों अथवा सहयोग न मिल सकने के कारण धनार्जन का यह स्वर्ण अवसर व्यर्थ सिद्व हो रहा है। जंगलों की कटाई करके उपनिवेश बसाने के लिए भी सरकार ने अत्यंत सुलभ सुविधाओं पर भूभाग देने की योजना बनाई है। इक्की-दुक्की ईसाई संस्थाओं