जो इमारत का आने-जाने का रास्ता था, की ओर ही पानी मिलता। मैं तृतीय तल की चाली में रहता था। भीत में एक ही नाप की सलाखें ठुकी हुई, वह रास्ता और उसके पीछे कोठरियों की पंक्ति- इन चालों का ऐसा ही स्वरूप था। भोजन से निपटकर थोड़ा समय हो गया था। दोपहर के समय कोठरी में बैज्ञ था कि नीचे से एक छोटा सा पत्थर सलाखों से टकराया और नीचे गिर गया। पुनः नीचे से किसी ने ठीक तरह से फेंका। वह सलाखों से निकलकर मेरी कोठरी के द्वार पर आ गिरा। मैं
जो इमारत का आने-जाने का रास्ता था, की ओर ही पानी मिलता। मैं तृतीय तल की चाली में रहता था। भीत में एक ही नाप की सलाखें ठुकी हुई, वह रास्ता और उसके पीछे कोठरियों की पंक्ति- इन चालों का ऐसा ही स्वरूप था। भोजन से निपटकर थोड़ा समय हो गया था। दोपहर के समय कोठरी में बैज्ञ था कि नीचे से एक छोटा सा पत्थर सलाखों से टकराया और नीचे गिर गया। पुनः नीचे से किसी ने ठीक तरह से फेंका। वह सलाखों से निकलकर मेरी कोठरी के द्वार पर आ गिरा। मैं