मेरा आजीवन कारावास - Mera Aajivan Karavas

मन में राजनीति के विचारों से जो खलबली मची थी- अन्य विषय मिलने से वह कुछ शांत हो गई। भोजन से निपटकर, बरतन मांजकर पुनः उस हाल ही में बंद हुए सलाखोंवाले द्वार के निकट खड़ा रहा। सांझ हो गई। वही संध्या, वही रात, वही तात्तिवक विचारों से मिली हुई तात्कालिक शांति ‘सप्तर्षि’ कविता¹ के उत्तरार्ध का विषय बन गई है। आज दो आवेदन-पत्र दिए थे। डोंगरी छोड़ते ही उधर जो थोड़ा सा दूध मिलता था वह भी बंद हो जाने से तथा भायखला में केवल ज्वार की रोटी खाने से पेट खराब हो जाता था,


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मन में राजनीति के विचारों से जो खलबली मची थी- अन्य विषय मिलने से वह कुछ शांत हो गई। भोजन से निपटकर, बरतन मांजकर पुनः उस हाल ही में बंद हुए सलाखोंवाले द्वार के निकट खड़ा रहा। सांझ हो गई। वही संध्या, वही रात, वही तात्तिवक विचारों से मिली हुई तात्कालिक शांति ‘सप्तर्षि’ कविता¹ के उत्तरार्ध का विषय बन गई है। आज दो आवेदन-पत्र दिए थे। डोंगरी छोड़ते ही उधर जो थोड़ा सा दूध मिलता था वह भी बंद हो जाने से तथा भायखला में केवल ज्वार की रोटी खाने से पेट खराब हो जाता था,


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