चन्द्रकान्ता - Chandrakanta

पा कर चोबदार ने उसे पेश किया। दीवान हरदयालसिंह ने उससे पूछा – ‘यह कैसा कागज लाया है और क्या कहता है?’

जासूस ने अर्ज किया – ‘इस तरह के लिखे हुए कागज शहर में बहुत जगह चिपके हुए दिखाई दे रहे हैं। तिरमुहानियों पर, बाजार में, बड़ी-बड़ी सड़कों पर इसी तरह के कागज नजर पड़ते हैं। मैंने एक आदमी से पढ़वाया था जिसके सुनने से जी में डर पैदा हुआ और एक कागज उखाड़ कर दरबार में ले आया हूँ। बाजार में इन कागजों को पढ़-पढ़ कर लोग बहुत घबरा रहे हैं।’


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पा कर चोबदार ने उसे पेश किया। दीवान हरदयालसिंह ने उससे पूछा – ‘यह कैसा कागज लाया है और क्या कहता है?’

जासूस ने अर्ज किया – ‘इस तरह के लिखे हुए कागज शहर में बहुत जगह चिपके हुए दिखाई दे रहे हैं। तिरमुहानियों पर, बाजार में, बड़ी-बड़ी सड़कों पर इसी तरह के कागज नजर पड़ते हैं। मैंने एक आदमी से पढ़वाया था जिसके सुनने से जी में डर पैदा हुआ और एक कागज उखाड़ कर दरबार में ले आया हूँ। बाजार में इन कागजों को पढ़-पढ़ कर लोग बहुत घबरा रहे हैं।’


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