चन्द्रकान्ता - Chandrakanta



हरदयालसिंह – ‘एक ही जासूस के मरने से सभी के छक्के छूट गए।’

महाराज – ‘खैर, आज शाम को हमारे कुल जासूसों को ले कर बाग में आओ, या तो कुछ काम ही निकालेंगे या सारे जासूस तोप के सामने रख कर उड़ा दिए जाएँगे, फिर जो कुछ होगा देखा जाएगा। मैं खुद उस हरामजादे को पकड़ूँगा।’

हरदयालसिंह – ‘जो हुक्म।’

महाराज – ‘बस अब जाओ, जो हमने कहा है उसकी फिक्र करो।’

दीवान हरदयालसिंह महाराज से विदा हो अपने मकान पर गए, मगर हैरान थे कि क्या करें,


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हरदयालसिंह – ‘एक ही जासूस के मरने से सभी के छक्के छूट गए।’

महाराज – ‘खैर, आज शाम को हमारे कुल जासूसों को ले कर बाग में आओ, या तो कुछ काम ही निकालेंगे या सारे जासूस तोप के सामने रख कर उड़ा दिए जाएँगे, फिर जो कुछ होगा देखा जाएगा। मैं खुद उस हरामजादे को पकड़ूँगा।’

हरदयालसिंह – ‘जो हुक्म।’

महाराज – ‘बस अब जाओ, जो हमने कहा है उसकी फिक्र करो।’

दीवान हरदयालसिंह महाराज से विदा हो अपने मकान पर गए, मगर हैरान थे कि क्या करें,


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