उस कमरे में बैठे जिसमें कुँवर वीरेंद्रसिंह की आँख खुली थी। आज भी वह कमरा वैसा ही सजा हुआ है जैसा पहले दिन कुमार ने देखा था, हाँ इतना फर्क है कि आज कुमारी चंद्रकांता की तस्वीर उसमें नहीं है।
जब सब लोग निश्चित होकर बैठ गए तब राजा सुरेंद्रसिंह ने सिद्धनाथ योगी से पूछा – ‘यह खूबसूरत पहाड़ी जिसमें छोटे-छोटे कई बाग हैं, हमारे ही इलाके में है मगर आज तक कभी इसे देखने की नौबत नहीं पहुँची। क्या इस बाग से ऊपर-ही-ऊपर कोई और रास्ता भी बाहर जाने का है?’
उस कमरे में बैठे जिसमें कुँवर वीरेंद्रसिंह की आँख खुली थी। आज भी वह कमरा वैसा ही सजा हुआ है जैसा पहले दिन कुमार ने देखा था, हाँ इतना फर्क है कि आज कुमारी चंद्रकांता की तस्वीर उसमें नहीं है।
जब सब लोग निश्चित होकर बैठ गए तब राजा सुरेंद्रसिंह ने सिद्धनाथ योगी से पूछा – ‘यह खूबसूरत पहाड़ी जिसमें छोटे-छोटे कई बाग हैं, हमारे ही इलाके में है मगर आज तक कभी इसे देखने की नौबत नहीं पहुँची। क्या इस बाग से ऊपर-ही-ऊपर कोई और रास्ता भी बाहर जाने का है?’