इतने में एक साधु रामरज से रंगी हुई कफनी पहने, रामनन्दी तिलक लगाये हाथ में खंजरी लिए कुछ दूर नदी के किनारे बैठा यह गाता हुआ दिखाई पड़ा-
‘‘गये चुनार क्रूर बहुरंगी लाये चारचितारी*।
संग में उनके पण्डित देवता, जो हैं सगुन बिचारी।।
इनसे रहना बहुत संभल के रमल चले अति कारी।
क्या बैठे हो तुम बेफिकरे, काम करो कोई भारी।।
यह आवाज कान में पड़ते ही तेजसिंह ने गौर से उस तरफ देखा। वह साधु भी इन्हीं की तरफ मुंह करके गा रहा था। तेजसिंह
इतने में एक साधु रामरज से रंगी हुई कफनी पहने, रामनन्दी तिलक लगाये हाथ में खंजरी लिए कुछ दूर नदी के किनारे बैठा यह गाता हुआ दिखाई पड़ा-
‘‘गये चुनार क्रूर बहुरंगी लाये चारचितारी*।
संग में उनके पण्डित देवता, जो हैं सगुन बिचारी।।
इनसे रहना बहुत संभल के रमल चले अति कारी।
क्या बैठे हो तुम बेफिकरे, काम करो कोई भारी।।
यह आवाज कान में पड़ते ही तेजसिंह ने गौर से उस तरफ देखा। वह साधु भी इन्हीं की तरफ मुंह करके गा रहा था। तेजसिंह