चन्द्रकान्ता - Chandrakanta

गये और सैर करते-करते चश्में के किनारे पहुंचे। देखा कि अहमद और भगवानदास एक चट्टान पर बैठे बातें कर रहे हैं, पैर में बेड़ी पड़ी है। कुमार को देख दोनों उठ खड़े हुए, झुककर सलाम किया और बोले, ‘‘अब तो हम लोगों का कसूर माफ होना चाहिए।’’ कुमार ने कहा, ‘‘हाँ थोड़े रोज और सब्र करो।’’

कुछ देर तक वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह टहलते और मेवों को तोड़कर खाते रहे। इसके बाद तेजसिंह ने कहा, ‘‘अब चलना चाहिए। देर हो गई।’’ कुमार ने कहा, ‘‘चलो।’’ दोनों बाहर आये तेजसिंह ने कहा,


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गये और सैर करते-करते चश्में के किनारे पहुंचे। देखा कि अहमद और भगवानदास एक चट्टान पर बैठे बातें कर रहे हैं, पैर में बेड़ी पड़ी है। कुमार को देख दोनों उठ खड़े हुए, झुककर सलाम किया और बोले, ‘‘अब तो हम लोगों का कसूर माफ होना चाहिए।’’ कुमार ने कहा, ‘‘हाँ थोड़े रोज और सब्र करो।’’

कुछ देर तक वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह टहलते और मेवों को तोड़कर खाते रहे। इसके बाद तेजसिंह ने कहा, ‘‘अब चलना चाहिए। देर हो गई।’’ कुमार ने कहा, ‘‘चलो।’’ दोनों बाहर आये तेजसिंह ने कहा,


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