“मुझको इजाजत मिले कि इस खत को ले जाऊं क्योंकि शिवदत्तसिंह से बातचीत करने की मेरे मन में बड़ी लालसा है।” कुमार ने कहा, “इतनी बड़ी फौज में तुम्हारा अकेला जाना अच्छा नहीं है।”
तेजसिंह ने कहा, “कोई हर्ज नहीं, जाने दीजिए।” आखिर कुमार ने अपनी कमर से खंजर निकालकर दिया जिसे देवीसिंह ने लेकर सलाम किया, खत बटुए में रख ली और तेजसिंह के चरण छूकर रवाना हुए।
महाराज शिवदत्तसिंह के पल्टन वालों में कोई भी देवीसिंह को नहीं पहचानता था।
“मुझको इजाजत मिले कि इस खत को ले जाऊं क्योंकि शिवदत्तसिंह से बातचीत करने की मेरे मन में बड़ी लालसा है।” कुमार ने कहा, “इतनी बड़ी फौज में तुम्हारा अकेला जाना अच्छा नहीं है।”
तेजसिंह ने कहा, “कोई हर्ज नहीं, जाने दीजिए।” आखिर कुमार ने अपनी कमर से खंजर निकालकर दिया जिसे देवीसिंह ने लेकर सलाम किया, खत बटुए में रख ली और तेजसिंह के चरण छूकर रवाना हुए।
महाराज शिवदत्तसिंह के पल्टन वालों में कोई भी देवीसिंह को नहीं पहचानता था।