चन्द्रकान्ता - Chandrakanta



ऐसी-ऐसी बातें करते हुए कुंअर वीरेन्द्रसिंह की आंखों से आंसू जारी थे और लंबी-लंबी सांसें ले रहे थे। आधी रात के लगभग जा चुकी थी। जिस कोठरी में कुमार कैद थे उसके सामने सजे हुए दलान में चार-पांच शीशे जल रहे थे, कुमार का जी जब बहुत घबड़ाया सर उठाकर उस तरफ देखने लगे। एकबारगी पांच-सात लौंडियां एक तरफ से निकल आईं और हांडी, ढोल, दीवारगीर, झाड़, बैठक, कंवल, मृदंगी वगैरह शीशों को जलाया जिनकी रोशनी से एकदम दिन-सा हो गया। बाद इसके


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ऐसी-ऐसी बातें करते हुए कुंअर वीरेन्द्रसिंह की आंखों से आंसू जारी थे और लंबी-लंबी सांसें ले रहे थे। आधी रात के लगभग जा चुकी थी। जिस कोठरी में कुमार कैद थे उसके सामने सजे हुए दलान में चार-पांच शीशे जल रहे थे, कुमार का जी जब बहुत घबड़ाया सर उठाकर उस तरफ देखने लगे। एकबारगी पांच-सात लौंडियां एक तरफ से निकल आईं और हांडी, ढोल, दीवारगीर, झाड़, बैठक, कंवल, मृदंगी वगैरह शीशों को जलाया जिनकी रोशनी से एकदम दिन-सा हो गया। बाद इसके


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