चन्द्रकान्ता - Chandrakanta

रात बीत गई बल्कि घंटा भर दिन चढ़ आया पर कुमार अपने पलंग पर से न उठे।

तेजसिंह ने आकर देखा तो कुमार चादर से मुंह लपेटे पड़े हैं, मुंह की तरफ का बिल्कुल कपड़ा गीला हो रहा है। दिल में समझ गये कि वनकन्या का इश्क पूरे तौर पर असर कर गया है, इस वक्त नसीहत करना भी उचित नहीं। आवाज दी, “आप सोते हैं या जागते हैं?”

कुमार-(मुंह खोलकर) नहीं, जागते तो हैं।

तेज-फिर उठे क्यों नहीं? आप तो रोज सबेरे ही स्नान-पूजा से छुट्टी कर लेते हैं, आज क्या हुआ?


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रात बीत गई बल्कि घंटा भर दिन चढ़ आया पर कुमार अपने पलंग पर से न उठे।

तेजसिंह ने आकर देखा तो कुमार चादर से मुंह लपेटे पड़े हैं, मुंह की तरफ का बिल्कुल कपड़ा गीला हो रहा है। दिल में समझ गये कि वनकन्या का इश्क पूरे तौर पर असर कर गया है, इस वक्त नसीहत करना भी उचित नहीं। आवाज दी, “आप सोते हैं या जागते हैं?”

कुमार-(मुंह खोलकर) नहीं, जागते तो हैं।

तेज-फिर उठे क्यों नहीं? आप तो रोज सबेरे ही स्नान-पूजा से छुट्टी कर लेते हैं, आज क्या हुआ?


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