चन्द्रकान्ता - Chandrakanta



तेजसिंह ने कुमार के हाथ में दिया, उन्होंने खोलकर पढ़ा-

बरवा

“सुख सम्पत्ति सब त्याग्यो जिनके हेत।
वे निरमोही ऐसे, सुधिहु न लेत॥

राज छोड़ बन जोगी भसम रमाय।
विरह अनल की धूनी तापत हाय॥”

-कोई वियोगिनी

पढ़ते ही आंखें डबडबा आईं, बंधे गले से अटककर बोले, “उसको अंदर बुलाओ जो खत लाया है।” हुक्म पाते ही चोबदार उस नकाबपोश सवार को लेने बाहर गया मगर तुरंत वापस आकर बोला-”वह सवार तो मालूम नहीं कहां चला गया!”

इस बात को सुनते ही


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तेजसिंह ने कुमार के हाथ में दिया, उन्होंने खोलकर पढ़ा-

बरवा

“सुख सम्पत्ति सब त्याग्यो जिनके हेत।
वे निरमोही ऐसे, सुधिहु न लेत॥

राज छोड़ बन जोगी भसम रमाय।
विरह अनल की धूनी तापत हाय॥”

-कोई वियोगिनी

पढ़ते ही आंखें डबडबा आईं, बंधे गले से अटककर बोले, “उसको अंदर बुलाओ जो खत लाया है।” हुक्म पाते ही चोबदार उस नकाबपोश सवार को लेने बाहर गया मगर तुरंत वापस आकर बोला-”वह सवार तो मालूम नहीं कहां चला गया!”

इस बात को सुनते ही


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