रात बीत गई, पूरब की तरफ से धीरे – धीरे सफेदी निकलने लगी और लड़ाई बंद कर दी गई।
शब्दार्थ:
बेहोशी की बारूद से आग लगने या मकान उड़ जाने का खौफ नहीं होता, उसमें धुआं बहुत होता है और जिसके दिमाग में धुआं चढ़ जाता है वह फौरन बेहोश हो जाता है।
चन्द्रकान्ता ( तीसरा भाग : अठारहवाँ बयान)
तेजसिंह वगैरह ऐयारों के साथ कुमार खोह से निकल कर तिलिस्म की तरफ रवाना हुए। एक रात रास्ते में बिता कर दूसरे दिन सवेरे जब रवाना हुए तो एक नकाबपोश सवार दूर से दिखाई पड़ा,
रात बीत गई, पूरब की तरफ से धीरे – धीरे सफेदी निकलने लगी और लड़ाई बंद कर दी गई।
शब्दार्थ:
बेहोशी की बारूद से आग लगने या मकान उड़ जाने का खौफ नहीं होता, उसमें धुआं बहुत होता है और जिसके दिमाग में धुआं चढ़ जाता है वह फौरन बेहोश हो जाता है।
चन्द्रकान्ता ( तीसरा भाग : अठारहवाँ बयान)
तेजसिंह वगैरह ऐयारों के साथ कुमार खोह से निकल कर तिलिस्म की तरफ रवाना हुए। एक रात रास्ते में बिता कर दूसरे दिन सवेरे जब रवाना हुए तो एक नकाबपोश सवार दूर से दिखाई पड़ा,