चन्द्रकान्ता - Chandrakanta



यह कह कर कुमार ने खत पढ़ा –

‘किसी तरह यह तिलिस्मी किताब मेरे हाथ लग गई जो तुम्हें देती हूँ। अब जल्दी तिलिस्म तोड़ कर कुमारी चंद्रकांता को छुड़ाओ। वह बेचारी बड़ी तकलीफ में पड़ी होगी। चुनारगढ़ में लड़ाई हो रही है, तुम भी वहीं जाओ और अपनी जवाँमर्दी दिखा कर फतह अपने नाम लिखाओ।

– तुम्हारी दासी…

वियोगिनी।’

कुमार – ‘तेजसिंह तुम भी पढ़ लो।’

तेजसिंह – (खत पढ़ कर) ‘न मालूम यह वनकन्या मनुष्य है या अप्सरा, कैसे-कैसे काम इसके हाथ से होते हैं।’


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यह कह कर कुमार ने खत पढ़ा –

‘किसी तरह यह तिलिस्मी किताब मेरे हाथ लग गई जो तुम्हें देती हूँ। अब जल्दी तिलिस्म तोड़ कर कुमारी चंद्रकांता को छुड़ाओ। वह बेचारी बड़ी तकलीफ में पड़ी होगी। चुनारगढ़ में लड़ाई हो रही है, तुम भी वहीं जाओ और अपनी जवाँमर्दी दिखा कर फतह अपने नाम लिखाओ।

– तुम्हारी दासी…

वियोगिनी।’

कुमार – ‘तेजसिंह तुम भी पढ़ लो।’

तेजसिंह – (खत पढ़ कर) ‘न मालूम यह वनकन्या मनुष्य है या अप्सरा, कैसे-कैसे काम इसके हाथ से होते हैं।’


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