'हम तो एक रूपया सैकड़ा देंगे। एक कौड़ी बेसी नहीं। तुम्हें लेना हो तो लो, नहीं अदालत से ले लेना। एक रूपया सैकड़े ब्याज कम नहीं होता।'
'मालूम होता है, रुपए की गरमी हो गई है।'
'गरमी उन्हें होती है, जो एक के दस लेते हैं। हम तो मजूर हैं। हमारी गरमी पसीने के रास्ते बह जाती है। मुझे खूब याद है, तुमने बैल के लिए तीस रुपए दिए थे। उसके सौ हुए और अब सौ के दो सौ हो गए। इसी तरह तुम लोगों ने किसानों को लूट-लूट कर मजूर बना डाला
'हम तो एक रूपया सैकड़ा देंगे। एक कौड़ी बेसी नहीं। तुम्हें लेना हो तो लो, नहीं अदालत से ले लेना। एक रूपया सैकड़े ब्याज कम नहीं होता।'
'मालूम होता है, रुपए की गरमी हो गई है।'
'गरमी उन्हें होती है, जो एक के दस लेते हैं। हम तो मजूर हैं। हमारी गरमी पसीने के रास्ते बह जाती है। मुझे खूब याद है, तुमने बैल के लिए तीस रुपए दिए थे। उसके सौ हुए और अब सौ के दो सौ हो गए। इसी तरह तुम लोगों ने किसानों को लूट-लूट कर मजूर बना डाला