'रोज-रोज आने से मरजाद भी तो नहीं रहती।
झुनिया हँस कर तिरछी नजरों से देखती हुई बोली - वही मरजाद तो दे रही हूँ। महीने में एक बार आओगे, ठंडा पानी दूँगी। पंद्रहवें दिन आओगे, चिलम पाओगे। सातवें दिन आओगे, खाली बैठने को माची दूँगी। रोज-रोज आओगे, कुछ न पाओगे।
'दरसन तो दोगी?'
'दरसन के लिए पूजा करनी पड़ेगी।'
यह कहते-कहते जैसे उसे कोई भूली हुई बात याद आ गई। उसका मुँह उदास हो गया। वह विधवा है। उसके नारीत्व के द्वार पर पहले
'रोज-रोज आने से मरजाद भी तो नहीं रहती।
झुनिया हँस कर तिरछी नजरों से देखती हुई बोली - वही मरजाद तो दे रही हूँ। महीने में एक बार आओगे, ठंडा पानी दूँगी। पंद्रहवें दिन आओगे, चिलम पाओगे। सातवें दिन आओगे, खाली बैठने को माची दूँगी। रोज-रोज आओगे, कुछ न पाओगे।
'दरसन तो दोगी?'
'दरसन के लिए पूजा करनी पड़ेगी।'
यह कहते-कहते जैसे उसे कोई भूली हुई बात याद आ गई। उसका मुँह उदास हो गया। वह विधवा है। उसके नारीत्व के द्वार पर पहले