धनिया आपे से बाहर थी। शायद इसलिए भी कि झुनिया अब कमाऊ पुरुष की स्त्री थी और उसे प्रसन्न में रखने में ज्यादा मसलहत थी।
तब होरी ने आँगन में आ कर कहा - मैं तेरे पैरों पड़ता हूँ धनिया, चुप रह। मेरे मुँह में कालिख मत लगा। हाँ, अभी मन न भरा हो तो और सुन।
धनिया फुंकार मार कर उधर दौड़ी - तुम भी मोटी डाल पकड़ने चले। मैं ही दोसी हूँ। यह तो मेरे ऊपर फूल बरसा रही है?
संग्राम का क्षेत्र बदल गया।
'जो छोटों के मुँह लगे, वह छोटा।'
धनिया आपे से बाहर थी। शायद इसलिए भी कि झुनिया अब कमाऊ पुरुष की स्त्री थी और उसे प्रसन्न में रखने में ज्यादा मसलहत थी।
तब होरी ने आँगन में आ कर कहा - मैं तेरे पैरों पड़ता हूँ धनिया, चुप रह। मेरे मुँह में कालिख मत लगा। हाँ, अभी मन न भरा हो तो और सुन।
धनिया फुंकार मार कर उधर दौड़ी - तुम भी मोटी डाल पकड़ने चले। मैं ही दोसी हूँ। यह तो मेरे ऊपर फूल बरसा रही है?
संग्राम का क्षेत्र बदल गया।
'जो छोटों के मुँह लगे, वह छोटा।'