तो मुझे क्या मिलता। आखिर मैंने झख मार कर उनकी पूँछ पकड़ी। किसी न किसी तरह यह वैतरणी तो पार करनी ही है।
रायसाहब को ऐसा आवेश आ रहा था कि इस दुष्ट को गोली मार दें। इसी बदमाश ने सब्ज बाग दिखा कर उन्हें खड़ा किया और अब अपनी सफाई दे रहा है। पीठ में धूल भी नहीं लगने देता, लेकिन परिस्थिति जबान बंद किए हुए थी।
'तो अब आपके किए कुछ नहीं हो सकता?'
'ऐसा ही समझिए।'
'मैं पचास हजार पर भी समझौता करने को तैयार हूँ।'
'राजा साहब किसी तरह न मानेंगे।'
तो मुझे क्या मिलता। आखिर मैंने झख मार कर उनकी पूँछ पकड़ी। किसी न किसी तरह यह वैतरणी तो पार करनी ही है।
रायसाहब को ऐसा आवेश आ रहा था कि इस दुष्ट को गोली मार दें। इसी बदमाश ने सब्ज बाग दिखा कर उन्हें खड़ा किया और अब अपनी सफाई दे रहा है। पीठ में धूल भी नहीं लगने देता, लेकिन परिस्थिति जबान बंद किए हुए थी।
'तो अब आपके किए कुछ नहीं हो सकता?'
'ऐसा ही समझिए।'
'मैं पचास हजार पर भी समझौता करने को तैयार हूँ।'
'राजा साहब किसी तरह न मानेंगे।'