कल घर सँभालेगा ही। भगवान उसे सुखी रखे। हमारे रुपए भी थोड़ा-थोड़ा देते चलो। सूद ही तो बढ़ रहा है।
'तुम्हारी एक-एक पाई दूँगा भाभी, हाथ में पैसे आने दो। और खा ही जाएँगे, तो कोई बाहर के तो नहीं हैं, हैं तो तुम्हारे ही।'
सहुआइन ऐसी विनोद-भरी चापलूसियों से निरस्त्र हो जाती थी। मुस्कराती हुई अपनी राह चली गई। होरी लपक कर बैलों के पास पहुँच गया और उन्हें पौर में डाल कर चक्कर देने लगा। सारे गाँव का यही एक खलिहान था। कहीं मँड़ाई हो रही थी,
कल घर सँभालेगा ही। भगवान उसे सुखी रखे। हमारे रुपए भी थोड़ा-थोड़ा देते चलो। सूद ही तो बढ़ रहा है।
'तुम्हारी एक-एक पाई दूँगा भाभी, हाथ में पैसे आने दो। और खा ही जाएँगे, तो कोई बाहर के तो नहीं हैं, हैं तो तुम्हारे ही।'
सहुआइन ऐसी विनोद-भरी चापलूसियों से निरस्त्र हो जाती थी। मुस्कराती हुई अपनी राह चली गई। होरी लपक कर बैलों के पास पहुँच गया और उन्हें पौर में डाल कर चक्कर देने लगा। सारे गाँव का यही एक खलिहान था। कहीं मँड़ाई हो रही थी,