गोदान - Godan

चितवन में, अंगों के विलास में हर्ष का उन्माद था, जिससे उसकी बोटी-बोटी नाचती रहती थी, सिर से पाँव तक भूसे के अणुओं में सनी, पसीने से तर, सिर के बाल आधे खुले, वह दौड़-दौड़ कर अनाज ओसा रही थी, मानो तन-मन से कोई खेल खेल रही हो।

मातादीन ने कहा - आज साँझ तक अनाज बाकी न रहे सिलिया! तू थक गई हो तो मैं आऊँ?

सिलिया प्रसन्न मुख बोली - तुम काहे को आओगे पंडित! मैं संझा तक सब ओसा दूँगी।

'अच्छा, तो मैं अनाज ढो-ढो कर रख आऊँ। तू अकेली क्या-क्या कर लेगी?'


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चितवन में, अंगों के विलास में हर्ष का उन्माद था, जिससे उसकी बोटी-बोटी नाचती रहती थी, सिर से पाँव तक भूसे के अणुओं में सनी, पसीने से तर, सिर के बाल आधे खुले, वह दौड़-दौड़ कर अनाज ओसा रही थी, मानो तन-मन से कोई खेल खेल रही हो।

मातादीन ने कहा - आज साँझ तक अनाज बाकी न रहे सिलिया! तू थक गई हो तो मैं आऊँ?

सिलिया प्रसन्न मुख बोली - तुम काहे को आओगे पंडित! मैं संझा तक सब ओसा दूँगी।

'अच्छा, तो मैं अनाज ढो-ढो कर रख आऊँ। तू अकेली क्या-क्या कर लेगी?'


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