'क्या कहा पंडित ने?'
'कहते हैं, मेरा तुमसे कोई वास्ता नहीं।'
'अच्छा! ऐसा कहते हैं!'
'समझते होंगे, इस तरह अपने मुँह की लाली रख लेंगे, लेकिन जिस बात को दुनिया जानती है, उसे कैसे छिपा लेंगे? मेरी रोटियाँ भारी हैं, न दें। मेरे लिए क्या? मजूरी अब भी करती हूँ, तब भी करूँगी। सोने को हाथ-भर जगह तुम्हीं से मागूँगी तो क्या तुम न दोगे?'
धनिया दयार्द्र हो कर बोली - जगह की कौन कमी है बेटी - तू चल मेरे घर रह।
होरी ने कातर स्वर में कहा - बुलाती तो है,
'क्या कहा पंडित ने?'
'कहते हैं, मेरा तुमसे कोई वास्ता नहीं।'
'अच्छा! ऐसा कहते हैं!'
'समझते होंगे, इस तरह अपने मुँह की लाली रख लेंगे, लेकिन जिस बात को दुनिया जानती है, उसे कैसे छिपा लेंगे? मेरी रोटियाँ भारी हैं, न दें। मेरे लिए क्या? मजूरी अब भी करती हूँ, तब भी करूँगी। सोने को हाथ-भर जगह तुम्हीं से मागूँगी तो क्या तुम न दोगे?'
धनिया दयार्द्र हो कर बोली - जगह की कौन कमी है बेटी - तू चल मेरे घर रह।
होरी ने कातर स्वर में कहा - बुलाती तो है,