अब भी न पटती थी। झुनिया के मन में बैठ गया था कि यह पक्का मतलबी, बेदर्द आदमी है, मुझे केवल भोग की वस्तु समझता है। चाहे मैं मरूँ या जिऊँ, उसकी इच्छा पूरी किए जाऊँ, उसे बिलकुल गम नहीं। सोचता होगा, यह मर जायगी तो दूसरी लाऊँगा, लेकिन मुँह धो रखें बच्चू! मैं ही ऐसी अल्हड़ थी कि तुम्हारे फंदे में आ गई। तब तो पैरों पर सिर रखे देता था। यहाँ आते ही न जाने क्यों जैसे इसका मिजाज ही बदल गया। जाड़ा आ गया था, पर न ओढ़न, न बिछावन। रोटी-दाल से जो दो-चार रुपए बचते,
अब भी न पटती थी। झुनिया के मन में बैठ गया था कि यह पक्का मतलबी, बेदर्द आदमी है, मुझे केवल भोग की वस्तु समझता है। चाहे मैं मरूँ या जिऊँ, उसकी इच्छा पूरी किए जाऊँ, उसे बिलकुल गम नहीं। सोचता होगा, यह मर जायगी तो दूसरी लाऊँगा, लेकिन मुँह धो रखें बच्चू! मैं ही ऐसी अल्हड़ थी कि तुम्हारे फंदे में आ गई। तब तो पैरों पर सिर रखे देता था। यहाँ आते ही न जाने क्यों जैसे इसका मिजाज ही बदल गया। जाड़ा आ गया था, पर न ओढ़न, न बिछावन। रोटी-दाल से जो दो-चार रुपए बचते,