इन दिनों जो कोई मालती से मिलता वह उससे मेहता की तारीफो के पुल बाँध देती, जैसे कोई नवदीक्षित अपने नए विश्वासों का ढिंढोरा पीटता फिरे। सुरूचि का ध्यान भी उसे न रहता। और बेचारे मेहता दिल में कट कर रह जाते थे। वह कड़ी और कड़वी आलोचना तो बड़े शौक से सुनते थे, लेकिन अपनी तारीफ सुन कर जैसे बेवकूफ बन जाते थे, मुँह जरा-सा निकल आता था, जैसे कोई फबती कसी गई हो। और मालती उन औरतों में न थी, जो भीतर रह सके। वह बाहर ही रह सकती थी,
इन दिनों जो कोई मालती से मिलता वह उससे मेहता की तारीफो के पुल बाँध देती, जैसे कोई नवदीक्षित अपने नए विश्वासों का ढिंढोरा पीटता फिरे। सुरूचि का ध्यान भी उसे न रहता। और बेचारे मेहता दिल में कट कर रह जाते थे। वह कड़ी और कड़वी आलोचना तो बड़े शौक से सुनते थे, लेकिन अपनी तारीफ सुन कर जैसे बेवकूफ बन जाते थे, मुँह जरा-सा निकल आता था, जैसे कोई फबती कसी गई हो। और मालती उन औरतों में न थी, जो भीतर रह सके। वह बाहर ही रह सकती थी,