इस व्यंग्य का आनंद ले कर मेहता की ओर आँखें मारते हुए कहा - पुरुष तो आपके लिए इतने सम्मान की वस्तु न थी।
मालती झेंपी नहीं। इस संकेत का आशय समझ कर जोश-भरे स्वर में बोली - लेकिन अब हो गई हूँ, इसलिए कि मैंने पुरुष का जो रूप अपने परिचितों की परिधि में देखा था, उससे यह कहीं सुंदर है। पुरुष इतना सुंदर, इतना कोमल हृदय....
मेहता ने मालती की ओर दीन-भाव से देखा और बोले - नहीं मालती, मुझ पर दया करो, नहीं मैं यहाँ से भाग जाऊँगा।
इस व्यंग्य का आनंद ले कर मेहता की ओर आँखें मारते हुए कहा - पुरुष तो आपके लिए इतने सम्मान की वस्तु न थी।
मालती झेंपी नहीं। इस संकेत का आशय समझ कर जोश-भरे स्वर में बोली - लेकिन अब हो गई हूँ, इसलिए कि मैंने पुरुष का जो रूप अपने परिचितों की परिधि में देखा था, उससे यह कहीं सुंदर है। पुरुष इतना सुंदर, इतना कोमल हृदय....
मेहता ने मालती की ओर दीन-भाव से देखा और बोले - नहीं मालती, मुझ पर दया करो, नहीं मैं यहाँ से भाग जाऊँगा।