'तुम जान भी चाहो, तो दे दूँ'।
'जान देने का अरथ भी समझते हो'
'तुम समझा दो न।'
'जान देने का अरथ है, साथ रह कर निबाह करना। एक बार हाथ पकड़ कर उमिर भर निबाह करते रहना, चाहे दुनिया कुछ कहे, चाहे माँ-बाप, भाई-बंद, घर-द्वार सब कुछ छोड़ना पड़े। मुँह से जान देने वाले बहुतों को देख चुकी। भौरों की भाँति फूल का रस ले कर उड़ जाते हैं। तुम भी वैसे ही न उड़ जाओगे?'
गोबर के एक हाथ में गाय की पगहिया थी। दूसरे हाथ से उसने झुनिया
'तुम जान भी चाहो, तो दे दूँ'।
'जान देने का अरथ भी समझते हो'
'तुम समझा दो न।'
'जान देने का अरथ है, साथ रह कर निबाह करना। एक बार हाथ पकड़ कर उमिर भर निबाह करते रहना, चाहे दुनिया कुछ कहे, चाहे माँ-बाप, भाई-बंद, घर-द्वार सब कुछ छोड़ना पड़े। मुँह से जान देने वाले बहुतों को देख चुकी। भौरों की भाँति फूल का रस ले कर उड़ जाते हैं। तुम भी वैसे ही न उड़ जाओगे?'
गोबर के एक हाथ में गाय की पगहिया थी। दूसरे हाथ से उसने झुनिया