'खाल जाय भाड़ में। मैं अब तुमसे बात न करूँगी।
'कहीं हम लोगों के हाथ कुछ न लगा और दूसरों ने अच्छे शिकार मारे तो मुझे बड़ी झेंप होगी।'
एक चौड़ा नाला मुँह फैलाए बीच में खड़ा था। बीच की चट्टानें उसके दाँतों-सी लगती थीं। धार में इतना वेग था कि लहरें उछली पड़ती थीं। सूर्य मध्याह्न आ पहुँचा था और उसकी प्यासी किरणें जल में क्रीड़ा कर रही थीं।
मालती ने प्रसन्न हो कर कहा - अब तो लौटना पड़ा।
'क्यों उस पार चलेंगे। यहीं तो शिकार मिलेंगे।'
'खाल जाय भाड़ में। मैं अब तुमसे बात न करूँगी।
'कहीं हम लोगों के हाथ कुछ न लगा और दूसरों ने अच्छे शिकार मारे तो मुझे बड़ी झेंप होगी।'
एक चौड़ा नाला मुँह फैलाए बीच में खड़ा था। बीच की चट्टानें उसके दाँतों-सी लगती थीं। धार में इतना वेग था कि लहरें उछली पड़ती थीं। सूर्य मध्याह्न आ पहुँचा था और उसकी प्यासी किरणें जल में क्रीड़ा कर रही थीं।
मालती ने प्रसन्न हो कर कहा - अब तो लौटना पड़ा।
'क्यों उस पार चलेंगे। यहीं तो शिकार मिलेंगे।'