'धारा में कितना वेग है। मैं तो बह जाऊँगी।'
'अच्छी बात है। तुम यहीं बैठो, मैं जाता हूँ।'
'हाँ, आप जाइए। मुझे अपने जान से बैर नहीं है।'
मेहता ने पानी में कदम रखा और पाँव साधते हुए चले। ज्यों-ज्यों आगे जाते थे, पानी गहरा होता जाता था। यहाँ तक कि छाती तक आ गया।
मालती अधीर हो उठी। शंका से मन चंचल हो उठा। ऐसी विकलता तो उसे कभी न होती थी। ऊँचे स्वर में बोली - पानी गहरा है। ठहर जाओ, मैं भी आती हूँ।
'नहीं-नहीं, तुम फिसल जाओगी। धार तेज है।'
'धारा में कितना वेग है। मैं तो बह जाऊँगी।'
'अच्छी बात है। तुम यहीं बैठो, मैं जाता हूँ।'
'हाँ, आप जाइए। मुझे अपने जान से बैर नहीं है।'
मेहता ने पानी में कदम रखा और पाँव साधते हुए चले। ज्यों-ज्यों आगे जाते थे, पानी गहरा होता जाता था। यहाँ तक कि छाती तक आ गया।
मालती अधीर हो उठी। शंका से मन चंचल हो उठा। ऐसी विकलता तो उसे कभी न होती थी। ऊँचे स्वर में बोली - पानी गहरा है। ठहर जाओ, मैं भी आती हूँ।
'नहीं-नहीं, तुम फिसल जाओगी। धार तेज है।'