रख रहे हों। मिर्जा ने बढ़ावा दिया - शाबाश! मेरे शेर, वाह-वाह!
तंखा ने एक डग और रखा। मालूम हुआ, गर्दन टूटी जाती है।
'मार लिया मैदान! शबाश! जीते रहो पट्ठे।'
तंखा दो डग और बढ़े। आँखें निकली पड़ती थीं।
'बस, एक बार और जोर मारो दोस्त! सौ कदम की शर्त गलत। पचास कदम की ही रही।'
वकील साहब का बुरा हाल था। वह बेजान हिरन शेर की तरह उनको दबोचे हुए, उनका हृदय-रक्त चूस रहा था। सारी शक्तियाँ जवाब दे चुकी थीं। केवल लोभ, किसी
रख रहे हों। मिर्जा ने बढ़ावा दिया - शाबाश! मेरे शेर, वाह-वाह!
तंखा ने एक डग और रखा। मालूम हुआ, गर्दन टूटी जाती है।
'मार लिया मैदान! शबाश! जीते रहो पट्ठे।'
तंखा दो डग और बढ़े। आँखें निकली पड़ती थीं।
'बस, एक बार और जोर मारो दोस्त! सौ कदम की शर्त गलत। पचास कदम की ही रही।'
वकील साहब का बुरा हाल था। वह बेजान हिरन शेर की तरह उनको दबोचे हुए, उनका हृदय-रक्त चूस रहा था। सारी शक्तियाँ जवाब दे चुकी थीं। केवल लोभ, किसी