होरी बोला - तुझसे बना नहीं। उसे घर में आने ही न देना चाहिए था।
'सब कुछ कह के हार गई। टलती ही नहीं। धरना दिए बैठी है।'
'अच्छा चल, देखूँ कैसे नहीं उठती, घसीट कर बाहर निकाल दूँगा।'
'दाढ़ीजार भोला सब कुछ देख रहा था, पर चुप्पी साधे बैठा रहा। बाप भी ऐसे बेहया होते हैं।'
'वह क्या जानता था, इनके बीच क्या खिचड़ी पक रही है।'
'जानता क्यों नहीं था? गोबर दिन-रात घेरे रहता था तो क्या उसकी आँखें फूट गईं थीं! सोचना चाहिए था न, कि यहाँ क्यों दौड़-दौड़ आता है।'
होरी बोला - तुझसे बना नहीं। उसे घर में आने ही न देना चाहिए था।
'सब कुछ कह के हार गई। टलती ही नहीं। धरना दिए बैठी है।'
'अच्छा चल, देखूँ कैसे नहीं उठती, घसीट कर बाहर निकाल दूँगा।'
'दाढ़ीजार भोला सब कुछ देख रहा था, पर चुप्पी साधे बैठा रहा। बाप भी ऐसे बेहया होते हैं।'
'वह क्या जानता था, इनके बीच क्या खिचड़ी पक रही है।'
'जानता क्यों नहीं था? गोबर दिन-रात घेरे रहता था तो क्या उसकी आँखें फूट गईं थीं! सोचना चाहिए था न, कि यहाँ क्यों दौड़-दौड़ आता है।'