'हाँ, लेकिन इतनी रात गए, घर से निकालना उचित नहीं। पाँव भारी है, कहीं डर-डरा जाय, तो और अगत हो। ऐसी दसा में कुछ करते-धरते भी तो नहीं बनता!'
'हमें क्या करना है, मरे या जिए। जहाँ चाहे जाए। क्यों अपने मुँह में कालिख लगाऊँ? मैं तो गोबर को भी निकाल बाहर करूँगा।
धनिया ने गंभीर चिंता से कहा - कालिख जो लगनी थी, वह तो अब लग चुकी। वह अब जीते-जी नहीं छूट सकती। गोबर ने नौका डुबा दी।
'गोबर ने नहीं, डुबाई इसी ने। वह तो बच्चा था। इसके पंजे में आ गया।'
'हाँ, लेकिन इतनी रात गए, घर से निकालना उचित नहीं। पाँव भारी है, कहीं डर-डरा जाय, तो और अगत हो। ऐसी दसा में कुछ करते-धरते भी तो नहीं बनता!'
'हमें क्या करना है, मरे या जिए। जहाँ चाहे जाए। क्यों अपने मुँह में कालिख लगाऊँ? मैं तो गोबर को भी निकाल बाहर करूँगा।
धनिया ने गंभीर चिंता से कहा - कालिख जो लगनी थी, वह तो अब लग चुकी। वह अब जीते-जी नहीं छूट सकती। गोबर ने नौका डुबा दी।
'गोबर ने नहीं, डुबाई इसी ने। वह तो बच्चा था। इसके पंजे में आ गया।'