'कह, बुरा क्यों मानूँगी?'
'न कहूँगी, कहीं तुम बिगड़ने न लगो?'
'कहती हूँ, कुछ न बोलूँगी, कह तो।'
'तुम्हें झुनिया को घर में रखना न चाहिए था!'
'तब क्या करती? वह डूब मरती थी।'
'मेरे घर में रख देती। तब तो कोई कुछ न कहता।'
'यह तो तू आज कहती है। उस दिन भेज देती, तो झाड़ू ले कर दौड़ती!'
'इतने खरच में तो गोबर का ब्याह हो जाता।'
'होनहार को कौन टाल सकता है पगली! अभी इतने ही से गला नहीं छूटा, भोला अब अपनी गाय के
'कह, बुरा क्यों मानूँगी?'
'न कहूँगी, कहीं तुम बिगड़ने न लगो?'
'कहती हूँ, कुछ न बोलूँगी, कह तो।'
'तुम्हें झुनिया को घर में रखना न चाहिए था!'
'तब क्या करती? वह डूब मरती थी।'
'मेरे घर में रख देती। तब तो कोई कुछ न कहता।'
'यह तो तू आज कहती है। उस दिन भेज देती, तो झाड़ू ले कर दौड़ती!'
'इतने खरच में तो गोबर का ब्याह हो जाता।'
'होनहार को कौन टाल सकता है पगली! अभी इतने ही से गला नहीं छूटा, भोला अब अपनी गाय के