युवती रोने लगी। मातादीन ने इधर-उधर ताक कर उसका हाथ पकड़ लिया और समझाने लगा - तुम उसकी क्यों परवा करती हो झूना, चला गया, चला जाने दो। तुम्हारे लिए किस बात की कमी है - रूपया-पैसा, गहना-कपड़ा, जो चाहो मुझसे लो।
झुनिया ने धीरे से हाथ छुड़ा लिया और पीछे हट कर बोली - सब तुम्हारी दया है महराज! मैं तो कहीं की न रही। घर से भी गई, यहाँ से भी गई। न माया मिली, न राम ही हाथ आए। दुनिया का रंग-ढंग न जानती थी। इसकी मीठी-मीठी बातें सुन कर जाल में फँस गई।
युवती रोने लगी। मातादीन ने इधर-उधर ताक कर उसका हाथ पकड़ लिया और समझाने लगा - तुम उसकी क्यों परवा करती हो झूना, चला गया, चला जाने दो। तुम्हारे लिए किस बात की कमी है - रूपया-पैसा, गहना-कपड़ा, जो चाहो मुझसे लो।
झुनिया ने धीरे से हाथ छुड़ा लिया और पीछे हट कर बोली - सब तुम्हारी दया है महराज! मैं तो कहीं की न रही। घर से भी गई, यहाँ से भी गई। न माया मिली, न राम ही हाथ आए। दुनिया का रंग-ढंग न जानती थी। इसकी मीठी-मीठी बातें सुन कर जाल में फँस गई।