लिए कोई चार बूँद आँसू बहाने वाला भी नहीं। तब उसे वह दिन याद आया, जब उसकी सास जीती थी और खन्ना उड़ंकू न हुए थे। तब उसे सास का बात-बात पर बिगड़ना बुरा लगता था, आज उसे सास के उस क्रोध में स्नेह का रस घुला हुआ जान पड़ रहा था। तब वह सास से रूठ जाती थी और सास उसे दुलार कर मनाती थी। आज वह महीनों रूठी पड़ी रहे, किसे परवा है? एकाएक उसका मन उड़ कर माता के चरणों में जा पहुँचा। हाय! आज अम्माँ होती, तो क्यों उसकी यह दुर्दशा होती! उसके पास और कुछ न था,
लिए कोई चार बूँद आँसू बहाने वाला भी नहीं। तब उसे वह दिन याद आया, जब उसकी सास जीती थी और खन्ना उड़ंकू न हुए थे। तब उसे सास का बात-बात पर बिगड़ना बुरा लगता था, आज उसे सास के उस क्रोध में स्नेह का रस घुला हुआ जान पड़ रहा था। तब वह सास से रूठ जाती थी और सास उसे दुलार कर मनाती थी। आज वह महीनों रूठी पड़ी रहे, किसे परवा है? एकाएक उसका मन उड़ कर माता के चरणों में जा पहुँचा। हाय! आज अम्माँ होती, तो क्यों उसकी यह दुर्दशा होती! उसके पास और कुछ न था,