वह क्या तुमसे छिपा है? महीनों से भरपेट रोटी नसीब नहीं हुई। कितना समझाती हूँ, जान रख कर काम करो, लेकिन आराम तो हमारे भाग्य में लिखा ही नहीं।
सहसा होरी ने आँखें खोल दीं और उड़ती हुई नजरों से इधर-उधर ताका।
धनिया जैसे जी उठी। विह्वल हो कर उसके गले से लिपट कर बोली - अब कैसा जी है तुम्हारा? मेरे तो परान नहों में समा गए थे।
होरी ने कातर स्वर में कहा - अच्छा हूँ। न जाने कैसा जी हो गया था।
धनिया ने स्नेह में डूबी भर्त्सना से कहा - देह में दम तो है नहीं,
वह क्या तुमसे छिपा है? महीनों से भरपेट रोटी नसीब नहीं हुई। कितना समझाती हूँ, जान रख कर काम करो, लेकिन आराम तो हमारे भाग्य में लिखा ही नहीं।
सहसा होरी ने आँखें खोल दीं और उड़ती हुई नजरों से इधर-उधर ताका।
धनिया जैसे जी उठी। विह्वल हो कर उसके गले से लिपट कर बोली - अब कैसा जी है तुम्हारा? मेरे तो परान नहों में समा गए थे।
होरी ने कातर स्वर में कहा - अच्छा हूँ। न जाने कैसा जी हो गया था।
धनिया ने स्नेह में डूबी भर्त्सना से कहा - देह में दम तो है नहीं,