सँभालना-सहेजना, यह कौन करे- फिर वह घर बैठी तो नहीं रहती थी, झाड़ू-बुहारू, रसोई, चौका-बरतन, लड़कों की देखभाल यह कोई थोड़ा काम है। सोभा की औरत घर सँभाल लेती कि हीरा की औरत में यह सलीका था - जब से अलगौझा हुआ है, दोनों घरों में एक जून रोटी पकती है, नहीं सबको दिन में चार बार भूख लगती थी। अब खाएँ चार दफे, तो देखूँ। इस मालिकपन में गोबर की माँ की जो दुरगत हुई है, वह मैं ही जानता हूँ। बेचारी देवरानियों के फटे-पुराने कपड़े पहन कर दिन काटती थी। अपने खुद भूखी सो रही होगी,
सँभालना-सहेजना, यह कौन करे- फिर वह घर बैठी तो नहीं रहती थी, झाड़ू-बुहारू, रसोई, चौका-बरतन, लड़कों की देखभाल यह कोई थोड़ा काम है। सोभा की औरत घर सँभाल लेती कि हीरा की औरत में यह सलीका था - जब से अलगौझा हुआ है, दोनों घरों में एक जून रोटी पकती है, नहीं सबको दिन में चार बार भूख लगती थी। अब खाएँ चार दफे, तो देखूँ। इस मालिकपन में गोबर की माँ की जो दुरगत हुई है, वह मैं ही जानता हूँ। बेचारी देवरानियों के फटे-पुराने कपड़े पहन कर दिन काटती थी। अपने खुद भूखी सो रही होगी,