धनिया घर का हाल कह कर उसे दु:खी न करना चाहती थी। बोली - कुछ नहीं है बेटा, जरा सिर में दर्द है। चलो, कपड़े उतारो, हाथ-मुँह धोओ। कहाँ थे तुम इतने दिन? भला, इस तरह कोई घर से भागता है? और कभी एक चिट्ठी तक न भेजी? आज साल-भर के बाद जाके सुधि ली है। तुम्हारी राह देखते-देखते आँखें फूट गईं। यही आसा बँधी रहती थी कि कब वह दिन आएगा और कब तुम्हें देखूँगी। कोई कहता था, मिरच भाग गया, कोई डमरा टापू बताता था। सुन-सुन कर जान सूखी जाती थी। कहाँ रहे इतने दिन?
धनिया घर का हाल कह कर उसे दु:खी न करना चाहती थी। बोली - कुछ नहीं है बेटा, जरा सिर में दर्द है। चलो, कपड़े उतारो, हाथ-मुँह धोओ। कहाँ थे तुम इतने दिन? भला, इस तरह कोई घर से भागता है? और कभी एक चिट्ठी तक न भेजी? आज साल-भर के बाद जाके सुधि ली है। तुम्हारी राह देखते-देखते आँखें फूट गईं। यही आसा बँधी रहती थी कि कब वह दिन आएगा और कब तुम्हें देखूँगी। कोई कहता था, मिरच भाग गया, कोई डमरा टापू बताता था। सुन-सुन कर जान सूखी जाती थी। कहाँ रहे इतने दिन?