रहा होगा। जा कर दुलारी की दुकान से गेहूँ का आटा, चावल-घी उधार लाई। इधर महीनों से सहुआइन एक पैसे की चीज उधार न देती थी, पर आज उसने एक बार भी न पूछा, पैसे कब दोगी।
उसने पूछा - गोबर तो खूब कमा के आया है न?
धनिया बोली - अभी तो कुछ नहीं खुला दीदी! अभी मैंने भी कुछ कहना उचित न समझा। हाँ, सबके लिए किनारदार साड़ियाँ लाया है। तुम्हारे आसिरबाद से कुसल से लौट आया, मेरे लिए तो यही बहुत है।
दुलारी ने असीस दिया - भगवान करे, जहाँ रहे कुसल से रहे। माँ-बाप को और क्या चाहिए,
रहा होगा। जा कर दुलारी की दुकान से गेहूँ का आटा, चावल-घी उधार लाई। इधर महीनों से सहुआइन एक पैसे की चीज उधार न देती थी, पर आज उसने एक बार भी न पूछा, पैसे कब दोगी।
उसने पूछा - गोबर तो खूब कमा के आया है न?
धनिया बोली - अभी तो कुछ नहीं खुला दीदी! अभी मैंने भी कुछ कहना उचित न समझा। हाँ, सबके लिए किनारदार साड़ियाँ लाया है। तुम्हारे आसिरबाद से कुसल से लौट आया, मेरे लिए तो यही बहुत है।
दुलारी ने असीस दिया - भगवान करे, जहाँ रहे कुसल से रहे। माँ-बाप को और क्या चाहिए,