प्रतिज्ञा - Pratigya

कोई आगे-पीछे नजर भी तो नहीं आता था! आखिर जब इन्हीं लोगों का दिया खाती थी,तो यहाँ आने में कौन-सी बाधा थी? जब से वह यहाँ आई, उसने कभी कमलाप्रसाद से बातचीत नहीं की। फिर कमलाप्रसाद ने उसके लिए रेशमी साड़ी क्यों ली? वह तो एक ही कृपण हैं, उदारता उनमें कहाँ से आ गई? सुमित्रा ने भी तो साड़ियाँ न माँगी थीं। अगर उसके लिए साड़ी लानी थी, तो मेरे लिए लाने की क्या जरूरत थी? मैं उसकी ननद नहीं, देवरानी नहीं, जेठानी नहीं, केवल आसरैत हूँ।


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कोई आगे-पीछे नजर भी तो नहीं आता था! आखिर जब इन्हीं लोगों का दिया खाती थी,तो यहाँ आने में कौन-सी बाधा थी? जब से वह यहाँ आई, उसने कभी कमलाप्रसाद से बातचीत नहीं की। फिर कमलाप्रसाद ने उसके लिए रेशमी साड़ी क्यों ली? वह तो एक ही कृपण हैं, उदारता उनमें कहाँ से आ गई? सुमित्रा ने भी तो साड़ियाँ न माँगी थीं। अगर उसके लिए साड़ी लानी थी, तो मेरे लिए लाने की क्या जरूरत थी? मैं उसकी ननद नहीं, देवरानी नहीं, जेठानी नहीं, केवल आसरैत हूँ।


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