लेकिन इस घर को त्याग देने का संकल्प करके भी पूर्णा निकल न सकी? कहाँ जाएगी? जा ही कहाँ सकती है? इतनी जल्दी चला जाना क्या इस लाँछन को और भी सुदृढ़ न कर देगा। विधवा पर दोषारोपण करना कितना आसान है। जनता को उसके विषय में नीची-से-नीची धारणा करते देर नहीं लगती, मानो कुवासना ही वैधव्य की स्वाभाविक वृत्ति है, मानो विधवा हो जाना मन की सारी दुर्वासनाओं, सारी दुर्बलताओं का उमड़ आना है। पूर्णा केवल करवट बदल कर रह गई।
बारह बजे के पहले तो कमलाप्रसाद कभी अंदर सोने न आते,
लेकिन इस घर को त्याग देने का संकल्प करके भी पूर्णा निकल न सकी? कहाँ जाएगी? जा ही कहाँ सकती है? इतनी जल्दी चला जाना क्या इस लाँछन को और भी सुदृढ़ न कर देगा। विधवा पर दोषारोपण करना कितना आसान है। जनता को उसके विषय में नीची-से-नीची धारणा करते देर नहीं लगती, मानो कुवासना ही वैधव्य की स्वाभाविक वृत्ति है, मानो विधवा हो जाना मन की सारी दुर्वासनाओं, सारी दुर्बलताओं का उमड़ आना है। पूर्णा केवल करवट बदल कर रह गई।
बारह बजे के पहले तो कमलाप्रसाद कभी अंदर सोने न आते,