न जा सकी। आज इच्छा न रहते हुए भी उसे भोजन करना पड़ा। उपवास करके लोगों को मनमानी आलोचनाएँ करने का अवसर वह क्यों देती?
पूर्णा ने मुस्करा कर कहा - 'मैं चलूँगी, यहाँ अकेली कैसे रहूँगी?'
पूर्णा ने बात बनाई - 'बेचारे आ कर लौट गए होंगे।'
पूर्णा - 'मना लेने में कोई बड़ी हानि तो न थी?'
पूर्णा - 'तुम तो हँसी उड़ाती हो। पति किसी कारण रूठ जाए, तो क्या उसे मनाना स्त्री का धर्म नहीं है?'
पूर्णा - 'तुम्हीं अपने दिल से सोचो।'
न जा सकी। आज इच्छा न रहते हुए भी उसे भोजन करना पड़ा। उपवास करके लोगों को मनमानी आलोचनाएँ करने का अवसर वह क्यों देती?
पूर्णा ने मुस्करा कर कहा - 'मैं चलूँगी, यहाँ अकेली कैसे रहूँगी?'
पूर्णा ने बात बनाई - 'बेचारे आ कर लौट गए होंगे।'
पूर्णा - 'मना लेने में कोई बड़ी हानि तो न थी?'
पूर्णा - 'तुम तो हँसी उड़ाती हो। पति किसी कारण रूठ जाए, तो क्या उसे मनाना स्त्री का धर्म नहीं है?'
पूर्णा - 'तुम्हीं अपने दिल से सोचो।'